Shri SaiDham Sirali
सबका मालिक एक‌

ॐ साईं राम

आज से करीब 12 वर्ष पहले सिराली निवासी श्री अनिल जी भायरे (गुर्जर) ने एक सुबह स्वप्न में देखा कि उनकी निजी भूमि पर लाल पत्थर की मेहराब वाला बाबा का एक मंदिर बना है, जिसके बाहर खड़े होकर वो बाबा का दर्शन कर रहे हैं व कीर्तन सुन रहे हैं | इस स्वप्न के टूटने पर भी इसकी स्मृति उन्हे बनी रही, इसके तीन वर्ष के बाद उनका विवाह हुआ| विवाह के पश्चात वे सपत्निक शिर्डी बाबा के दर्शन हेतु गये | वहाँ बाबा के दर्शन कर उन्हें स्वप्न की सारी स्मृति हो आई व मन में विचार आया कि स्वप्न वाले स्थान पर ही बाबा का मंदिर होना चाहिये |


सिराली वापस आकर उन्होने इस संबंध में अपने परिवार से चर्चा की व अपनी निजी भूमि पर बाबा का मंदिर बनाने का प्रस्ताव समस्त परिवार के सामने रखा | श्री अनिल जी भायरे जी के प्रस्ताव को समस्त परिवार पिता श्री शिव प्रसाद जी भायरे, माता जी श्रीमती मौजकुँवर, बड़े भैया श्री नरेन्द्र जी भायरे, भाभी श्रीमती जयंती भायरे व पत्नी श्रीमती शिव कुमारी भायरे सभी ने सहर्ष स्वीकार कर मंदिर के लिये भूमि दान करने की स्वीकृति दी | मकान निर्माण, व्यवसाय व विवाह में काफी धन खर्च होने के कारण आर्थिक स्थिति ठीक ना होने की वजह से मंदिर निर्माण का कार्य उस समय कार्यरूप में परिवर्तित नहीं हो पाया |


बाबा को तो उनके समय पर भक्तो के कंल्याण हेतू प्रकट होना ही था, और इसके लिये वो क्या क्या लीला करने वाले थे यह तो स्वयं बाबा ही समझ सकते हैं | ऐसे ही श्री साईं के अनन्य भक्त श्री दयाशंकर जी करोड़े ( दयालु भैया ) व धर्मपत्नी श्रीमती ज्योति करोड़े जो कि सिराली से 7 कि. मी. दूर ग्राम कालकुंड में निवास करते थे | वो साईं बाबा से अत्यधिक प्रेम होने के कारण वर्ष में दो माह सपत्निक शिर्डी में ही रहते थे, तथा बाबा से यही प्रार्थना करते थे कि, बाबा आप हमारे साथ ही चलो | यह सम्पूर्ण सांसारिक सुख व्यर्थ है, यदि आप नहीं हैं, और यही विचार कर वे कालकुंड ग्राम में ही बाबा का एक छोटा मंदिर निर्माण करने की योजना बनाने लगे, परंतु बाबा को तो अपने विराट स्वरूप मे ही भक्तों के कल्याणार्थ प्रकट होना था |


बाबा ने इस कार्य के निमित्त श्री गणेश जी राजपूत (निवासी : बंदीमुहाड़िया) को चुना जिन्होने माध्यम बन कर श्री दयाशंकर जी करोड़े ( दयालु भैया ) व श्री अनिल जी भायरे को एक दूसरे के मन की भावनाओं से अवगत कराया, और अंतत: दोनो ने निर्णय लिया कि बाबा का म‍ंदिर सिराली मे ही बनना चाहिये, दोनों ने मिलकर सभी साथियों के साथ गुर्जर छात्रावास ( सिराली ) में एक छोटी सी बैठक रखी और वहाँ उपस्थित सभी लोगो ने मंदिर बनवाने का आश्वासन दिया |


15 मार्च 2007 को भूमिपूजन शिर्डी के मुख्य पुजारी श्री बाला साहेब जोशी जी के द्वारा किया गया व बाबा की सवा फीट की प्रतिमा लाकर स्थापित कर दी गई | यह स्थान आज द्वारका माई के नाम से जाना जाता है | इसी द्वारका माई स्थान पर श्रीमती ज्योति करोड़े एक दिन जब साईं सच्चरित्र का पाठ कर रही थी वहीं उन्हें जागी हुई आँखों से स्वयं बाबा नृत्य करते हुए दिखे | विशाल मंदिर के निर्माण हेतु विशाल धन राशि की आवश्यकता थी | बाबा ने दयालु भैया को स्वप्न दिया कि मै तो आजीवन मांगता रहा तुम क्यों नहीं मांगते और दूसरे ही दिन से वे स्वयं उनके साथियों के साथ गाँव गाँव जा कर चंदा एकत्रित करने लगे | चंदा एकत्रित करने के इस कार्य में मंदिर के पुजारी श्री सुनील जी पाराशर‌ ने भी महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया |


बाबा की असीम कृपा से 27 नवंबर 2009 को मंदिर अपने भव्य स्वरूप में सबके सामने तैयार था | शिर्डी एवं खंडवा से पधारे पूज्यनीय विद्वान पंडित श्री बाला साहेब जोशी, श्री संजय जी पाटनी, श्री केशव जी बिनवानी व श्री विजय जी बिनवानी के द्वारा प्राण प्रतिष्ठा का कार्य संपन्न हुआ |



" ग्यारह वचन‌ "

जो शिरडी मेँ आएगा,
आपद दूर भगाएगा ।

चढ़े समाधी की सीड़ी पर,
पैर तले दु:ख की पीड़ी पर ।

त्याग शरीर चला जाउंगा,
भक्त हेतु दौड़ा आउंगा ।

मन में रखना दृढ़ विश्वास,
करे समाधी पूरी आस ।

मुझे सदा जीवित ही जानो,
अनुभव करो सत्य पहचानो ।

मेरी शरण आ खाली जाए,
हो कोई तो मुझे बताए ।

जैसा भाव रहा जिस जन का,
वैसा रूप रहा मेरे मन का ।

आ सहायता लो भरपूर,
जो मांगा वो नहीं है दूर ।

भार तुम्हारा मुझ पर होगा,
वचन ना मेरा झूठा होगा ।

मुझ मे लीन वचन, मन, काया,
उस का रिण ना कभी चुकाया ।

धन्य धन्य वो भक्त अनन्य,
मेरी शरण तज जिसे ना अन्य ।
"स्तुति"

नमो जगगुरुम् ईश्वरम् साईंनाथम् ,
पुरुषोत्तम सर्वलोकम् प्रकाशम् !
चिदानंद रूपम् नमो विश्व आतम् ,
योगीश्वरम् करूणाकरम् साईंनाथम् !!
"दैनिक‌ कर्म‌"

काकड़ आरती (5:15 प्रात:काल)
माखन मिश्री का भोग‌
मंगल स्नान (अभिषेक)
बाल भोग(हलवा)(9:00 प्रात:काल)
श्रृंगार आरती(संक्षिप्त आरती)
विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ‌
साईं सच्चरित्र का पाठ
कनकधारा स्त्रोत का पाठ
श्री सुक्त पाठ
श्री पुरुषोक्त पाठ
भोग (गुरुवार को विशेष खिचड़ी)(12:00 मध्यान काल)
मध्यान आरती
धूप आरती (5:30 सायं काल सूर्यास्त के अनुसार)
दूध हलवे का भोग‌
भजन संगीत‌
भोग(सम्पूर्ण भोजन)
शेज आरती (10:00 रात्रि काल‌)