Baba ke Vachan
सबका मालिक एक‌

ॐ साईं राम

{ साईं सच्चरित्र से संकलित }

पृष्ठ क्र. 12
"जो, प्रेमपूर्वक मेरा नामस्मरण करेगा, मैं उसकी समस्त इच्छाएं पूर्ण कर दूंगा | उसकी भक्ति मे उत्तरोत्तर वृध्दि होगी | जो मेरे चरित्र और कृत्यों का श्रध्दापूर्वक गायन करेगा उसकी मै हर प्रकार से सहायता करूँगा | जो भक्तगण हृदय और प्राणों से मुझे चाहते हैं, उन्हें मेरी कथाएँ श्रवण करने मे प्रसन्नता होगी | विश्वास रखो कि जो मेरी लीलाओं का कीर्तन करेगा उसे परमानन्द और चिरसंतोष की उपलब्धि हो जाएगी | यह मेरा वैशिष्टय है कि, जो कोई अनन्य भाव से मेरी शरण आता है, जो श्रध्दापूर्वक मेरा पूजन, निरन्तर स्मरण और मेरा ही ध्यान किया करता है, उसको मै मुक्ति प्रदान कर देता हूँ | "
"जो नित्यप्रति मेरा नाम स्मरण और पूजन कर मेरी कथाओ‍ं और लीलाओं का प्रेमपूर्वक मनन करते हैं‍ ऎसे भक्तों में सांसारिक वासनाए‍ँ और अज्ञानरूपी प्रवृत्तियाँ कैसे ठहर सकती हैं ? मैं उन्हें मृत्यु के मुख से बचा लेता हूँ | "
"मेरी कथाएँ श्रवण करने से मुक्ति हो जाएगी | अत: मेरी कथाओं को श्रध्दापूर्वक सुनो, मनन करो | सुख और सन्तोष‍‍‍ प्राप्ति का सरल मार्ग ही यही है | इससे श्रोताओं के चित्त को शांति प्राप्त् होगी, ध्यान प्रगाढ़ और् विश्वास दृढ़ हो जाएगा, तब अखंड चैतन्यघन से अभिन्नता प्राप्त हो जाएगी | केवल 'साईं' 'साईं' के उच्चारण मात्र से ही उनके समस्त पाप नष्ट हो जाएँगे | "

पृष्ठ क्र. 16
" तुम चाहे कहीं भी रहो जो इच्छा हो सो करो परन्तु यह सदैव स्मरण रखो कि जो कुछ भी तुम करते हो, वह सब मुझे ज्ञात है | मै ही समस्त प्राणियों का प्रभु और घट‍ घट में व्याप्त हूँ | मेरे उदर में समस्त जड़ व चेतन प्राणी समाये हुए हैं | मै ही समस्त ब्रह्मांड का नियंत्रणकर्ता व संचालक हूँ | मै ही उत्पत्ति, स्थिति व संहारकर्ता हूँ | मेरी भक्ति करने वालों को कोई हानि नहीं पहुँचा सकता | मेरे ध्यान की उपेक्षा करने वाला माया के पाश मे फँस जाता है | समस्त जन्तु, चींटियाँ तथा दृश्यमान परिवर्त्तमान और स्थायी विश्व मेरे ही स्वरूप हैं |"

पृष्ठ क्र. 22
" इतनी दूर व्यर्थ क्यों भटकते हो अपना प्रयाग तो यहीं है, मुझ पर विश्वास रखो | "

पृष्ठ क्र. 34
" मेरे भक्तों के घर अन्न तथा वस्त्रों का कभी आभाव नहीं होगा | यह मेरा वैशिष्टय है कि जो भक्त मेरी शरण आ जाते हैं और अंत: करण से मेरे उपासक हैं, उनके कल्याणार्थ मै सदैव चिंतित रहता हूँ | "

कृष्ण भगवान ने भी गीता में यही समझाया है | इसलिये भोजन तथा वस्त्र के  लिये अधिक चिंता न करो | यदि कुछ माँगने की अभिलाषा है तो ईश्वर को ही माँगो सांसारिक मान व उपाधियाँ त्याग कर ईश कृपा तथा अभयदान प्राप्त करो और उन्ही के द्वारा सम्मानित होओ | सांसारिक साधनो से कुपथगामी मत बनो | अपने इष्ट को दृढ़ता से पकड़े रहो | समस्त इन्द्रियों और मन को ईश्वरीय चिंतन मे प्रवृत्त रखो | किसी पदार्थ से आकर्षित न हो, सदैव मेरे स्मरण मे मन लगाये रखो, ताकि वह देह, सम्पत्ति व ऎश्वर्य की ओर प्रवृत्त न हो | तब चित्त स्थिर, शांत, व निर्भय हो जाएगा | इस प्रकार की मन: स्थिति प्राप्त होना इस बात का प्रतीक है कि वह सुसंगति में है | यदि चित्त की चंचलता नष्ट न हुई तो उसे एकाग्र नहीं किया जा सकता |"

पृष्ठ क्र. 80.
"मैं फकीर हूँ, न तो मेरे स्त्री है न घर द्वार ही | सब चिंताओं को त्याग कर मैं एक ही स्थान पर रहता हूँ | फिर भी माया मुझे कष्ट पहुँचाया करती है | मै स्वयं को तो भूल चुका हूँ, परन्तु माया मुझे नहीं भूलती, क्योंकि वह मुझे अपने चक्र मे फसा लेती है | श्रीहरि की यह माया ब्रह्मादि को भी नहीं छोड़ती, फिर मुझ सरीखे फकीर का तो कहना ही क्या ? परन्तु जो हरि की शरण लेंगे, वे उनकी कृपा से मायाजाल से मुक्त हो जाएँगे |" इस प्रकार बाबा ने माया की शक्ति का परिचय दिया | भगवान श्रीकृष्ण भागवत मे कहते हैं कि " सन्त मेरे जीवित स्वरूप हैं |"
"वे भाग्यशाली, जिनके समस्त पाप नष्ट होने हों, वे ही मेरी उपासना की ओर अग्रसर होते हैं | यदि तुम केवल 'साईं साईं' का ही स्मरण करोगे तो मैं तुम्हें भवसागर से पार कर दूंगा |"

पृष्ठ क्र. 81.
"कोइ कितना भी दु:खित और पीड़ित क्यों न हो, जैसे ही वह मस्जिद की सीढ़ियों पर पैर रखता है, वह सुखी हो जाता है | मस्जिद का फ़कीर बहुत दयालु है और वह तुम्हारा रोग भी निर्मूल कर देगा | वह तो सब पर प्रेम और दया रखकर र‌क्षा करता है |"

पृष्ठ क्र. 95.
" यदि तुम श्रध्दापूर्वक मेरे सामने हाथ फैलाओगे तो मैं सदैव तुम्हारे साथ रहुँगा | यद्यपि मैं शरीर से यहाँ हूँ, परन्तु मुझे सात समुद्रों के पार भी घटित होने\ वाली घटनाओं का ज्ञान है | मैं तुम्हारे हृदय मे विराजित, तुम्हारे अन्तरस्थ ही हूँ | जिसका तुम्हारे तथा समस्त प्राणियों के हृदय में वास है, उसकी ही पूजा करो | धन्य और सौभाग्यशाली वही हैं, जो मेरे सर्वव्यापी स्वरूप से परिचित हैं |"

पृष्ठ क्र. 99.
ब्रह्म‌ज्ञान या आत्मानुभूति की योग्यताएँ
   सामान्य मनुष्यों को प्राय: अपने जीवन काल में ब्रह्म के दर्शन नहीं होते | उसकी प्राप्ति के लिये कुछ योग्यताओं का भी होना नितान्त आवश्यक है |

(1). मुमुक्षुत्व ( मुक्ति की तीव्र उत्कण्ठा )
       जो सोचता है कि मैं बन्धन मे हूँ और इस बन्धन से मुक्त होना चाहे तो इस ध्येय की प्राप्ति के लिये उत्सुकता और दृढ़ संकल्प से प्रयत्न करता रहे तथा प्रत्येक परिस्थिति का सामना करने को तैयार रहे, वही आध्यात्मिक मार्ग पर चलने योग्य है |

(2). विरक्ति
       लोक परलोक के समस्त पदार्थों से उदासीनता का भाव | ऎहिक वस्तुएँ, लाभ और प्रतिष्ठा जो कि कर्मजन्य हैं  - ‍ जब तक इनसे उदासीनता उत्पन्न न होगी, तब तक उसे आध्यात्मिक जगत् में प्रवेश करने का अधिकार नहीं |

(3). अन्तर्मुखता
       ईश्वर ने हमारी इन्द्रियों की रचना ऐसी की है कि उनकी स्वाभाविक वृत्ति सदैव बाहर की ओर आकृष्ट करती है | हमें सदैव बाहर का ही ध्यान रहता है, न कि अन्तर का | जो आत्मदर्शन और दैविक जीवन के इच्छुक हैं, उन्हें अपनी दृष्टि अंतर्मुखी बनाकर अपने आप में ही लीन होना चाहिए |

(4). पाप शुध्दि
       जब तक मनुष्य दुष्टता त्याग कर दुष्कर्म करना नहीं छोड़ता, तब तक न तो उसे पूर्ण शान्ति ही मिलती है और न मन ही स्थिर होता है | वह मात्र बुध्दि बल द्वारा ज्ञान लाभ कदापि नहीं कर सकता |

(5). उचित आचरण‌
       जब तक मनुष्य सत्यवादी, त्यागी और अन्तर्मुखी बनकर ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुये जीवन व्यतीत नहीं करता, तब तक उसे आत्मोपलब्धि संभव नहीं |

(6). सारवस्तु ग्रहण करना
       दो प्रकार की वस्तुएँ हैँ : नित्य और अनित्य | पहली आध्यात्मिक विषयों से संबंधित है तथा दूसरी सांसारिक विषयों से | मनुष्य को इन दोनो का सामना करना पड़ता है | उसे विवेक द्वारा किसी एक का चुनाव करना पड़ता है | विद्वान् पुरुष अनित्य से नित्य को श्रेयस्कर मानते हैं, परन्तु जो मूढ़मति हैं, वे आसक्तियों के वशीभूत होकर अनित्व को ही श्रेष्ठ जानकर उस पर आचरण करते हैं |

(7). मन और इन्द्रियों का निग्रह‌
       शरीर एक रथ है | आत्मा उसका स्वामी तथा बुद्धि सारथी है | मन लगाम है तथा इन्द्रियाँ उसके घोड़े | इन्द्रिय नियंत्रण ही उसका पथ है | जो अल्पबुद्धि है और जिनके मन चंचल हैं तथा जिनकी इन्द्रियाँ सारथी के दुष्ट घोड़ो के समान हैं,  वे अपने गन्तव्य स्थान तक नहीं पहुँचते तथा जन्म मृत्यु के चक्र में ही घूमते रहते हैं | परन्तु जो विवेकशील हैं जिन्होने अपने मन पर नियन्त्रण कर लिया है तथा जिनकी इन्द्रियाँ सारथी के उत्तम घोड़े के समान नियंत्रण में हैं, वे ही गन्तव्य स्थान पर पहुँच पाते हैं, अर्थात उन्हें परम पद की प्राप्ति हो जाती है और उनका पुनर्जन्म नहीं होता | जो व्यक्ति बुद्धि द्वारा मन को वश मे कर लेता है, वह अन्त मे अपना लक्ष्य प्राप्त कर, उस सर्वशक्तिमान भगवान विष्णु के लोक में पहुँच जाता है।

(8). मन की पवित्रता
      जब तक मनुष्य निष्काम कर्म नहीं करता, तब तक उसे चित्त की शुद्धि एवं आत्मदर्शन संभव नहीं है। विशुद्ध मन मे ही विवेक और वैराग्य उत्पन्न होते हैं, जिससे आत्म दर्शन के पथ में प्रगति हो जाती है। अहंकारशून्य हुए बिना तृष्णा से छुटकारा पाना संभव नहीं है। विषय वासना आत्मानुभूति के मार्ग मे विशेष बाधक है। यह धारणा कि मै एक शरीर हूँ भ्रम है। यदि तुम अपने जीवन के ध्येय (आत्मसाक्षातकार) को प्राप्त करने की अभिलाषा है तो इस धारणा का सर्वथा त्याग कर दो।

(9). गुरु की आवश्यकता
       आत्म‌ज्ञान  इतना गूढ़ और रहस्यमय है कि मात्र निजप्रयत्न से उसकी प्राप्ति संभव नहीं। इस कारण आत्मानुभूति प्राप्त गुरु की सहायता परम‌ आवश्यक है।अत्यंत कठिन परिश्रम और कष्टों के उपरांत भी दूसरे क्या दे सकते हैं, जो ऐसे गुरु की कृपा से सहज ही प्राप्त हो सकता है? जिसने स्वयं उस मार्ग का अनुसरण कर अनुभव कर लिया हो, वही अपने शिष्य को भी सरलता पूर्वक पग पग पर आध्यात्मिक उन्नति करा सकता है।

(10). अन्त मे ईश कृपा परमावश्यक है।
         जब भगवान किसी पर कृपा करते हैं तो उसे विवेक और वैराग्य दे कर इस भवसागर से पार कर देते हैं। यह आत्मानुभूति न तो नाना प्रकार की विद्याओं और बुद्धि द्वारा हो सकती है और न शुष्क वेदाध्ययन द्वारा ही। इसके लिये जिस किसी को ये आत्मा वरन करती है, उसी को प्राप्त होती है तथा उसी के सम्मुख वह अपना स्वरूप प्रकट करती है : कठोपनिषद में ऐसा ही वर्णन किया गया है।


 

" ग्यारह वचन‌ "

जो शिरडी मेँ आएगा,
आपद दूर भगाएगा ।

चढ़े समाधी की सीड़ी पर,
पैर तले दु:ख की पीड़ी पर ।

त्याग शरीर चला जाउंगा,
भक्त हेतु दौड़ा आउंगा ।

मन में रखना दृढ़ विश्वास,
करे समाधी पूरी आस ।

मुझे सदा जीवित ही जानो,
अनुभव करो सत्य पहचानो ।

मेरी शरण आ खाली जाए,
हो कोई तो मुझे बताए ।

जैसा भाव रहा जिस जन का,
वैसा रूप रहा मेरे मन का ।

आ सहायता लो भरपूर,
जो मांगा वो नहीं है दूर ।

भार तुम्हारा मुझ पर होगा,
वचन ना मेरा झूठा होगा ।

मुझ मे लीन वचन, मन, काया,
उस का रिण ना कभी चुकाया ।

धन्य धन्य वो भक्त अनन्य,
मेरी शरण तज जिसे ना अन्य ।
"स्तुति"

नमो जगगुरुम् ईश्वरम् साईंनाथम् ,
पुरुषोत्तम सर्वलोकम् प्रकाशम् !
चिदानंद रूपम् नमो विश्व आतम् ,
योगीश्वरम् करूणाकरम् साईंनाथम् !!
"दैनिक‌ कर्म‌"

काकड़ आरती (5:15 प्रात:काल)
माखन मिश्री का भोग‌
मंगल स्नान (अभिषेक)
बाल भोग(हलवा)(9:00 प्रात:काल)
श्रृंगार आरती(संक्षिप्त आरती)
विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ‌
साईं सच्चरित्र का पाठ
कनकधारा स्त्रोत का पाठ
श्री सुक्त पाठ
श्री पुरुषोक्त पाठ
भोग (गुरुवार को विशेष खिचड़ी)(12:00 मध्यान काल)
मध्यान आरती
धूप आरती (5:30 सायं काल सूर्यास्त के अनुसार)
दूध हलवे का भोग‌
भजन संगीत‌
भोग(सम्पूर्ण भोजन)
शेज आरती (10:00 रात्रि काल‌)