Sai Chamatkar
सबका मालिक एक‌

ॐ साईं राम

श्री साईं उस कल्पतरू के समान हैं जहाँ हर इच्छित वस्तु की प्राप्ति होती है। बाबा का प्रेम और करुणा का खजाना तो अनंत और अपरिमित है बस बटोरने की क्षमता हमारे पास होनी चाहिये। बाबा के जीवन काल में अनेको लोग चिंतित थे कि बाबा के जाने के बाद हमारा क्या होगा? बाबा की दया की वृष्टि जो सदा हम पर होती रहती है हम उस से वंचित हो जायेंगे, तब बाबा ने सभी को धीरज बंधाते हुए कहा कि तुम मुझे साढ़े तीन हाथ का देहधारी भर ना समझना। मेरे बाद मेरी समाधी बात करेगी, चलेगी फिरेगी। मेरी अस्थियों को भी सदा तुम जनकल्याण के लिये चिंतित पाओगे। बाबा ने अपने भक्तों मे किसी को गाणगापुर, किसी को नरसिंगबाड़ी भेजा और किसी को अपने पास ही रखा। शिरडी से दूर एक स्थान सिराली जो हरदा तहसील का एक ग्राम है। जहाँ आज सिराली में बाबा का म‍ंदिर अवस्थित है। वहाँ किसी समय में कचरा फेकनें का स्थान था और वहीं बाबा, श्रीमति ज्योति करोड़े को नृत्य करते दिखाई दिये थे। यह बाबा की इस स्थान पर उपस्थिती का पहला प्रमाण था।

बाबा की उपस्थिती का अन्य प्रमाण मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा की समय दिखाई दिया जब बाबा की ‍‍‍‍‍‍कई टन वजनी काफी उँची मूर्ती की स्थापना होनी थी। प्राण प्रतिष्ठा के एक दिन पहले बाबा की मूर्ति को नियत स्थान से कुछ इंच दूर रखा गया जिससे कि अगले दिन सरलता से उन्हे प्राण प्रतिष्ठा वाली जगह पर रखा जा सके। नियत दिन सिराली मे नर नारियों की अपार भीड़ एकत्रित हो गयी। मंत्रोच्चारण आरम्भ हो गया परंतु आश्चर्य कि मूर्ति अपने स्थान से नहीं हिली। मूर्ति को उपयुक्त स्थान पर रखने के लिये लगभग पचास युवक धक्का लगाने लगे लेकिन सब व्यर्थ, यहाँ तक कि मूर्ति के सिंहासन के नीचे लोहे का सरिया लगा कर भी उसे खिसकाने की कोशिश की गई किंतु सब व्यर्थ (लोहे का सरिया लगाने का निशान मंदिर मे आज भी देखे जा सकते हैं), और तब सभी भक्त चिंतित हो उठे कि "हे साईं ये कैसी परीक्षा है, मूर्ति टस से मस नहीं हो रही" भक्तों के आसुओ‍ं से मूर्ति के चरण धुल गये। तभी मानो बाबा ने सभी भक्तों को यह भाव दिया कि "तुमने मुझे मात्र मूर्ती समझ रखा है (सभी भक्तों द्वारा मूर्ती सरकाने का प्रयत्न और बाबा के होंठो पर शरारतपूर्ण मुस्कान की तस्वीर सौभाग्य से उपलब्ध है) जो मुझे लोहे के सरिये से सरकाने का प्रयत्न कर रहे हो।" और तब चार व्यक्तियों को छोड़ कर सभी लोग नीचे उतर आये, और उन्ही चार लोगो ने तब मामूली सा प्रयत्न कर मूर्ती को सही स्थान पर स्थापित कर दिया। इन सब बातों का तात्पर्य यह है कि बाबा ने प्रत्य‌क्ष प्रमाण दिया कि "यहाँ मुझे मात्र मूर्ती मत समझना मैं स्वयं यहाँ हूँ। बाबा की उपस्थिति के यहाँ अगणित प्रमाण हैं, समय समय पर उन्हे आपके सामने प्रस्तुत किया जाता रहेगा।


मूर्ती का सजीव होना :
सिराली स्थित म‍ंदिर में प्रात: काल की आरती से पूर्व, रोज की तरह ही एक सुबह थी। प्रात: चार बजे उस समय तक मंदिर में मुख्य पंडित श्री कन्हैयालाल जी ही थे। बाबा की मूर्ती का अभिषेक करते समय बाबा मूर्ती रूप मे ना रह कर सजीव हो उठे। उनके हाथ पैर कठोर ना रह कर मनुष्यों की तरह नर्म हो गये थे। यह चमत्कार देख एक बार तो मुख्य पंडित को कुछ समझ नहीं आया और वो जड़वत हो गये। कुछ देर बाद जब वो चेतन हुए तो सब कुछ पहले के समान था बाबा की मूर्ती अपनी जगह सुशोभित थी। इस घटना के बाद से सभी बाबा की सेबा के लिये और सावधान हो गये।


बाबा का कुएँ से पानी पीना :
बाबा के भोजन व पानी ग्रहण करने का समय नियत है व दिन में समयानुसार बाबा को प्रत्येक वस्तु का भोग लगाया जाता है। बाबा के मंदिर प्रागंण में एक कुआँ है। उस दिन जब एक भक्त नें दर्शनों के पश्चात कुएँ मे झाँका तो उन्हें कुएँ में बाबा की तस्वीर जैसी तैरती हुई दिखाई दी। इतने समय मंदिर के सानिध्य में रहने के बाद यहाँ घटने वाली घटनाओं का अर्थ यहाँ के निवासियों को समझ आ ही जाता है। वे मंदिर के अंदर की ओर ये चिल्लाते हुए दौड़े कि क्या बात है आज बाबा को समय पर पानी नहीं मिला तो बाबा कुएँ से पानी पी रहे हैं और पूछताछ करने पर पता चला कि वाकई उस दिन नियत समय से आधा घंटा देर हो चुकी थी।


बाबा के विचित्र भक्त:
बाबा के भक्त हम इन्सान ही नहीं अपितु जानवर व पक्षी भी है ऐसी ही एक घटना यहाँ दी गई है :

कौओं का जोड़ा : 2011 की गुरुपूर्णिमा से लगभग 10 दिनों से पूर्व एक विचित्र दृश्य देखने मे आया। रोज सुबह व दोपहर की आरती के समय ऐसा होता कि कहीं से कौओं का जोड़ा मंदिर के आस पास चक्कर लगाने लगता और वे मंदिर के काँचो पर अपनी चोंच मारा करते व मंदिर के अंदर आने का प्रयत्न करते रहते। उन्हे उड़ाने का भी प्रयत्न किया गया, आस पास यह भी देखा गया कि कहीं पक्षीयों ने अपने अंडे तो वहाँ नहीं दिये, किंतु वहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था और केवल आरती के समय ही वे वहाँ आते थे और आरती के बाद बिना किसी से सताये बाबा के ये भक्त वहाँ से चले भी जाते है। बाबा की महिमा बाबा ही जाने और वे अपने भक्तों को तो यों भी कोसो दूर से भी पैर में धागा बंधी चिड़िया जैसे खीच लेते हैं।

गाय की कथा : ये उस गाय की कथा जिसका मालिक उससे बहुत परेशान था। वह ना तो दूध देती और किसी भी पास आने वाले को सींगो से मारने का प्रयत्न करती परेशान हो उसे उसके मालिक ने मंदिर को दान कर दिया। बाबा के सानिध्य में आकर उसका स्वभाव पूर्णतया बदल गया ना सिर्फ उसने लोगों को मारना बंद कर दिया अपितु वह दूध भी देने लगी। इसी दूध से आजकल बाबा का अभिषेक किया जाता है।

 

" ग्यारह वचन‌ "

जो शिरडी मेँ आएगा,
आपद दूर भगाएगा ।

चढ़े समाधी की सीड़ी पर,
पैर तले दु:ख की पीड़ी पर ।

त्याग शरीर चला जाउंगा,
भक्त हेतु दौड़ा आउंगा ।

मन में रखना दृढ़ विश्वास,
करे समाधी पूरी आस ।

मुझे सदा जीवित ही जानो,
अनुभव करो सत्य पहचानो ।

मेरी शरण आ खाली जाए,
हो कोई तो मुझे बताए ।

जैसा भाव रहा जिस जन का,
वैसा रूप रहा मेरे मन का ।

आ सहायता लो भरपूर,
जो मांगा वो नहीं है दूर ।

भार तुम्हारा मुझ पर होगा,
वचन ना मेरा झूठा होगा ।

मुझ मे लीन वचन, मन, काया,
उस का रिण ना कभी चुकाया ।

धन्य धन्य वो भक्त अनन्य,
मेरी शरण तज जिसे ना अन्य ।
"स्तुति"

नमो जगगुरुम् ईश्वरम् साईंनाथम् ,
पुरुषोत्तम सर्वलोकम् प्रकाशम् !
चिदानंद रूपम् नमो विश्व आतम् ,
योगीश्वरम् करूणाकरम् साईंनाथम् !!
"दैनिक‌ कर्म‌"

काकड़ आरती (5:15 प्रात:काल)
माखन मिश्री का भोग‌
मंगल स्नान (अभिषेक)
बाल भोग(हलवा)(9:00 प्रात:काल)
श्रृंगार आरती(संक्षिप्त आरती)
विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ‌
साईं सच्चरित्र का पाठ
कनकधारा स्त्रोत का पाठ
श्री सुक्त पाठ
श्री पुरुषोक्त पाठ
भोग (गुरुवार को विशेष खिचड़ी)(12:00 मध्यान काल)
मध्यान आरती
धूप आरती (5:30 सायं काल सूर्यास्त के अनुसार)
दूध हलवे का भोग‌
भजन संगीत‌
भोग(सम्पूर्ण भोजन)
शेज आरती (10:00 रात्रि काल‌)